गरीब और कम आय वाले परिवारों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए क्या सिर्फ कर्ज देना काफी है? मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन का जवाब है- नहीं। उनका कहना है कि भारत के माइक्रोफाइनेंस सेक्टर को कर्ज बांटने के बजाय बचत, बीमा और स्थायी आजीविका पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। जरूरत से ज्यादा कर्ज देने और गलत तरीके से वित्तीय उत्पाद बेचने की प्रवृत्ति ने इस क्षेत्र में बार-बार संकट पैदा किए हैं। ऐसे में माइक्रोफाइनेंस संस्थानों को अपने काम करने के तरीके में बदलाव करना होगा। 9 अक्तूबर को नई दिल्ली में सा-धन के 21वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए नागेश्वरन ने कहा कि वित्तीय समावेशन का मकसद केवल लोगों तक कर्ज पहुंचाना नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक सुरक्षा बढ़ाना और आय के स्थायी साधन विकसित करना भी होना चाहिए।
माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में कर्ज से पहले बचत और बीमा पर जोर क्यों?
नागेश्वरन के मुताबिक, माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र में वित्तीय सेवाओं का क्रम बदलने की जरूरत है। अभी कर्ज देने पर ज्यादा जोर दिखाई देता है, जबकि बचत और बीमा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जरूरत से ज्यादा कर्ज देने और वित्तीय उत्पादों की गलत बिक्री से बचना जरूरी है। माइक्रोफाइनेंस संस्थान ग्रामीण परिवारों के करीब रहकर उनकी जरूरतों को समझ सकते हैं। ऐसे में उनकी भूमिका केवल ऋण उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें परिवारों की आजीविका से जुड़ी समस्याओं को समझने और आर्थिक सुरक्षा बढ़ाने में भी मदद करनी चाहिए। कम आय वाले परिवारों को केवल उधार लेकर खर्च चलाने के बजाय बचत बनाने, जोखिमों से सुरक्षा पाने और नियमित आमदनी के साधन विकसित करने के अवसर मिलने चाहिए।
जरूरत से ज्यादा कर्ज देने से बार-बार संकट कैसे पैदा होता है?
माइक्रोफाइनेंस सेक्टर का उद्देश्य उन लोगों तक वित्तीय सेवाएं पहुंचाना है, जिन्हें पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था से पर्याप्त सहायता नहीं मिल पाती। लेकिन जब किसी ग्राहक को उसकी चुकाने की क्षमता से अधिक कर्ज दिया जाता है, तो उसके लिए किस्तों का भुगतान करना मुश्किल हो सकता है। नागेश्वरन ने जरूरत से ज्यादा कर्ज देने और वित्तीय उत्पादों की गलत बिक्री को उद्योग की बार-बार सामने आने वाली समस्याओं से जोड़ा। उन्होंने कर्ज देने की प्रक्रिया में जिम्मेदारी और सावधानी बरतने पर जोर दिया। उनकी चेतावनी ऐसे समय में अहम है, जब माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र को कर्ज लेने वालों पर बढ़ते दबाव और ऋण देने के तौर-तरीकों से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। हालांकि, उन्होंने अपने संबोधन में इन समस्याओं के आकार या प्रभावित कर्जदारों की संख्या के विशिष्ट आंकड़े नहीं दिए। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और डिजिटल माध्यमों से वित्तीय सेवाएं देने के बढ़ते इस्तेमाल पर भी चिंता जताई। उनके अनुसार, तकनीक के इस्तेमाल के साथ माइक्रोफाइनेंस संस्थानों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। एआई आधारित प्रणालियां ग्राहकों की जानकारी के आधार पर कर्ज देने से जुड़े फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में दो तरह की समस्याओं से बचना जरूरी है- ग्राहकों को जरूरत से ज्यादा कर्ज मिलना और तकनीकी फिल्टर के कारण कुछ योग्य ग्राहकों का वित्तीय सेवाओं से बाहर हो जाना। नागेश्वरन ने कहा कि डिजिटल बिक्री और एआई तकनीक के दौर में संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न तो जरूरत से ज्यादा कर्ज दिया जाए और न ही तकनीकी प्रक्रियाओं के कारण ग्राहकों को व्यवस्थित रूप से बाहर रखा जाए।
नागेश्वरन ने कहा कि आजीविका का अर्थ केवल नौकरी पाना नहीं है। इसमें स्वरोजगार, छोटे कारोबार और सूक्ष्म उद्यमिता भी शामिल हैं। इसलिए माइक्रोफाइनेंस संस्थानों को ऐसी गतिविधियों पर ध्यान देना चाहिए, जो लोगों की आमदनी बढ़ाने और उन्हें लंबे समय तक आर्थिक रूप से सक्षम बनाने में मदद करें। उन्होंने कहा कि रोजगार पैदा करने में उद्यमियों की अहम भूमिका होती है। छोटे और बड़े, दोनों तरह के कारोबार रोजगार के अवसर तैयार करते हैं। इसके लिए जरूरी है कि उद्यमियों को अपना कारोबार शुरू करने और उसका विस्तार करने में अनावश्यक नियामकीय बाधाओं का सामना न करना पड़े। इस दृष्टिकोण के तहत वित्तीय सेवाओं का उद्देश्य सिर्फ कर्ज उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि लोगों को आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने और अपनी आय के स्रोत विकसित करने में सक्षम बनाना भी है।